उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 30 सितंबर को बालिका से दुष्कर्म के मामले में एक व्यक्ति की दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए कठोर कारावास की अवधि बारह से घटाकर दस वर्ष कर दी। न्यायमूर्ति रवींद्र मैठानी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की पीठ ने 10,000 रुपये का जुर्माना कायम रखा और दोषी को शेष सजा भुगतने का निर्देश दिया।

फैसला 23 सितंबर को सुरक्षित रखा गया था और एक सप्ताह बाद सुनाया गया। यह 2017 के अपराध से जुड़े फरवरी 2018 के निचली अदालत के फैसले के खिलाफ अपील थी। नया घटनाक्रम उस अपील पर हाईकोर्ट का निर्णय है, हाल में हुई किसी नई घटना की खबर नहीं।

बचाव पक्ष ने शिकायत दर्ज होने में देरी पर सवाल उठाए और कहा कि चिकित्सा तथा फोरेंसिक सामग्री अभियोजन का समर्थन नहीं करती। राज्य ने पीड़िता के बयान और एक प्रत्यक्षदर्शी के साक्ष्य पर भरोसा किया। रिकॉर्ड की जांच के बाद अदालत ने गवाही को सुसंगत और विश्वसनीय पाया, शिकायत में देरी का स्पष्टीकरण स्वीकार किया और दोषसिद्धि हटाने से इनकार कर दिया।

सजा घटाते समय पीठ ने नौ वर्ष से अधिक की अवधि पहले ही जेल में बिताने का उल्लेख किया। इसलिए अपील में राहत केवल कारावास की अवधि तक सीमित रही। आदेश का अर्थ तत्काल बिना शर्त रिहाई नहीं है। इस रिपोर्ट में बालिका की पहचान, परिवार का विवरण और निजी चिकित्सा जानकारी गोपनीय रखी गई है।