सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर को पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल लागू करने के लिए भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण की प्रस्तावित समय-सीमा स्वीकार करने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कार्यक्रम को अनुचित बताया और समय-सीमा तथा लागू करने से जुड़े अन्य विवादित प्रश्नों पर अपना आदेश सुरक्षित रखा।
FSSAI ने नियम बनाने और अधिसूचित करने के लिए चार महीने, फिर खाद्य व्यवसायों के लिए 365 दिन की स्वैच्छिक अनुपालन अवधि प्रस्तावित की थी। अदालत ने पूछा कि पहले हो चुके हितधारक विचार-विमर्श के बाद नई परामर्श प्रक्रिया और एक वर्ष का स्वैच्छिक अनुपालन क्यों चाहिए, और कहा कि वह बाध्यकारी कार्यक्रम तय करेगी। उसने तत्काल लागू करने की याचिकाकर्ता की मांग को भी अव्यावहारिक माना।
विचाराधीन प्रस्ताव में अधिक नमक, चीनी या वसा वाले माने गए उत्पादों पर सामने की ओर स्पष्ट लाल षट्कोणीय चेतावनी शामिल है। एक उद्योग संघ ने कहा कि वह फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनियों का विरोध नहीं करता, लेकिन लाल चिन्ह को भारत के मांसाहारी चिह्न से भ्रमित किए जाने और पोषक सीमा केवल 100 ग्राम के बजाय परोसने की मात्रा के आधार पर तय करने का मुद्दा उठाया। ये उद्योग की दलीलें हैं, अदालत द्वारा स्वीकार किए गए निष्कर्ष नहीं।
पीठ ने अभी अंतिम समय-सीमा प्रकाशित नहीं की है और सुनवाई में वर्णित चेतावनी-लेबल व्यवस्था अभी पूरे देश में लागू हो चुकी प्रणाली नहीं है। अदालत ने कहा कि उसके आगामी निर्देश नियामक पर बाध्यकारी होंगे और बाद में अनुपालन की समीक्षा का संकेत दिया। इसलिए 28 सितंबर की सुनवाई को पहले से लागू अंतिम नियम बताना निर्णय को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना होगा।
