कर्नाटक ने 1 अक्टूबर को निरीक्षण के ऐसे निष्कर्ष सामने रखे जिनमें अस्पतालों की दवा खरीद लागत और मरीजों से वसूली गई कीमतों में बड़े अंतर का आरोप है। इंडियन एक्सप्रेस ने स्वास्थ्य मंत्री यू. टी. खादर की प्रेस वार्ता की जानकारी दी। एएनआई ने खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन के 1 अक्टूबर के प्रेस नोट का हवाला दिया। जांच में कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाएं और अस्पताल की अन्य सामग्री भी शामिल हैं।

राज्य का कहना है कि अस्पतालों को खरीद में काफी छूट मिलती है, जबकि मरीजों से अक्सर छपे हुए अधिकतम खुदरा मूल्य के आसपास रकम ली जाती है। कर्नाटक ने केंद्र से बिल पर खरीद लागत और एमआरपी दिखाना अनिवार्य करने, मूल्य नियंत्रण का दायरा बढ़ाने और व्यापारिक मुनाफे की दरों को नियंत्रित करने की मांग की है। इस संबंध में खादर का पत्र 23 सितंबर का था, 1 अक्टूबर का नहीं।

एएनआई के अनुसार, 25 और 26 सितंबर के विशेष सत्यापन अभियान में 768 से अधिक प्रकार की सामग्री और 189 महंगी दवाओं की जांच हुई। आगे भी जांच की योजना है। ये प्रशासन के बताए निष्कर्ष हैं; इनसे हर अस्पताल के खिलाफ कानून उल्लंघन अपने आप साबित नहीं होता।

अलग से, ईटीहेल्थवर्ल्ड ने 1 अक्टूबर को निजी अस्पतालों के संगठन एएचपीआई का पक्ष प्रकाशित किया। संगठन ने सभी दवाओं पर एक समान मुनाफे की सीमा के विरुद्ध भंडारण, रखरखाव और चिकित्सा सेवाओं की लागत का तर्क दिया। यह व्यापक मूल्य-नीति पर उसका पक्ष है, कर्नाटक की जांच का विशिष्ट जवाब नहीं।

नए खुलासे से दवा के खर्च पर बहस को और आधार मिला है। हालांकि, मांगे गए राष्ट्रीय बिलिंग और मूल्य-संबंधी बदलाव लागू हो जाने की पुष्टि नहीं हुई है।