स्टील सचिव संदीप पाउंड्रिक ने 29 सितंबर को कहा कि भारत की नई स्टील नीति में 2047 तक सालाना 60 करोड़ मीट्रिक टन इस्पात-निर्माण क्षमता बनाने की योजना है। उन्होंने इसे अगले दो दशकों का रोडमैप बताया और कहा कि सरकार इसे जल्द सार्वजनिक करेगी। रिपोर्ट की समय-सीमा तक दस्तावेज सार्वजनिक नहीं था, इसलिए यह लक्ष्य नीति प्रस्ताव है, पूरी हो चुकी क्षमता या लागू गारंटी नहीं।
वित्त वर्ष 2025–26 में भारत की इस्पात-निर्माण क्षमता लगभग 22 करोड़ टन थी। मौजूदा 2017 नीति में 2030–31 तक 30 करोड़ टन क्षमता का लक्ष्य है, जबकि पहले के आधिकारिक बयानों में 2047 के लिए 50 करोड़ टन का लक्ष्य बताया गया था। इसलिए नया 60 करोड़ टन का आंकड़ा अधिक ऊंची मसौदा महत्वाकांक्षा है; उसका अंतिम शब्दांकन और लागू करने के उपाय प्रकाशित नीति पर निर्भर रहेंगे।
सचिव की टिप्पणियों के साथ देखे गए मसौदे में स्टील क्षेत्र की औसत उत्सर्जन तीव्रता को प्रति टन कच्चे इस्पात पर 2.54 टन कार्बन डाइऑक्साइड से घटाकर 2047 तक लगभग 1.54 टन करने का लक्ष्य है। यह भारत के 2070 नेट-जीरो लक्ष्य में योगदान देगा, लेकिन यह दीर्घकालीन लक्ष्य है—इस बात का प्रमाण नहीं कि कटौती हो चुकी है या इस नीति के तहत अलग-अलग संयंत्रों को बाध्यकारी सीमा मिल गई है।
रोडमैप में लौह अयस्क की मांग 77.2 करोड़ टन और कोकिंग कोयले की मांग 21.4 करोड़ टन होने का अनुमान है। इसमें बेहतर गुणवत्ता के अयस्क और कोयले की उपलब्धता के लिए विदेशी परिसंपत्तियां खरीदने, संयुक्त उपक्रम बनाने और आपूर्ति स्रोत बढ़ाने की योजना है। इन योजनाओं में वाणिज्यिक, पर्यावरणीय और भू-राजनीतिक जोखिम हैं, जो बाद की परियोजनाओं और मंजूरियों पर निर्भर करेंगे।
भारत ने अप्रैल से अगस्त तक 35 लाख टन तैयार इस्पात आयात किया, जो एक वर्ष पहले से 29.5% अधिक था; इसमें चीन की हिस्सेदारी 31.8% थी। यह व्यापार संदर्भ क्षमता और कच्चे माल पर जोर को समझाता है। रिपोर्ट की समय-सीमा तक स्टील मंत्रालय ने पूरी नीति जारी नहीं की थी और टिप्पणी के अनुरोध का जवाब नहीं दिया था; आधिकारिक पाठ प्रकाशित होने पर इस रिपोर्ट को अपडेट किया जाना चाहिए।
