दिल्ली हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत निजी आपराधिक शिकायत में आरोपी को किस चरण पर सुना जाना चाहिए, यह स्पष्ट किया है। 29 सितंबर को सुनाए और अपलोड किए गए फैसले में न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंदर डुडेजा ने कहा कि मजिस्ट्रेट पहले शिकायतकर्ता और उपस्थित गवाहों के वे शपथबद्ध बयान दर्ज करे जो कानून के अनुसार जरूरी हैं। कानून में इस परीक्षण से दी गई छूट लागू रहेगी।

इसके बाद यदि मजिस्ट्रेट को लगे कि शिकायत उस चरण पर खारिज करने के बजाय आगे बढ़ाने योग्य है, तो आरोपी को नोटिस दिया जाए। कथित अपराध का औपचारिक संज्ञान लेने का निर्णय आरोपी को अपनी बात रखने का अवसर देने के बाद ही हो सकता है। बार एंड बेंच ने 30 सितंबर को इस फैसले की रिपोर्ट प्रकाशित की। इस खबर के लिए प्रकाशित न्यायिक फैसले के संबंधित अंश भी स्वतंत्र रूप से पढ़े गए।

अदालत ने इस सुनवाई की सीमा भी बताई: आरोपी यह दिखा सकता है कि शिकायत और बयानों को उनके मौजूदा रूप में स्वीकार करने पर भी कोई अपराध नहीं बनता। इससे उसे उन बयानों को दर्ज करने की प्रक्रिया में हस्तक्षेप का अधिकार नहीं मिलता। पीठ ने केंद्र सरकार की यह दलील स्वीकार नहीं की कि जरूरी परीक्षण से पहले या बाद में नोटिस देने का विकल्प मजिस्ट्रेट पर छोड़ दिया जाए।

यह निर्णय खंडपीठ को भेजे गए प्रक्रियात्मक सवालों का उत्तर देता है; किसी व्यक्ति का दोष तय नहीं करता। औपचारिक संज्ञान और उसके बाद आरोपी को समन आदि जारी करने का निर्णय भी अलग चरण बने रहते हैं। मुख्य न्यायाधीश के निर्देशों के अधीन, संबंधित याचिकाएं 28 अक्टूबर को उचित पीठ के समक्ष रखी जानी हैं।