राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन के तहत सितंबर 2026 तक कुल 68 पेटाफ्लॉप क्षमता वाली 40 प्रणालियां स्थापित की जा चुकी थीं। पत्र सूचना कार्यालय यानी पीआईबी ने चार अक्टूबर को जारी पृष्ठभूमि विवरण में यह जानकारी दी। इसमें कार्यक्रम की अब तक की स्थिति बताई गई है। इसका अर्थ यह नहीं है कि रविवार को ही 40 मशीनें लगाई गईं। विवरण में उस दिन शुरू की गई किसी नई प्रणाली की पहचान भी नहीं दी गई है।

सरकार ने स्थापित प्रणालियों को तीन समूहों में बांटा है। 13 प्रणालियों की क्षमता एक पेटाफ्लॉप से अधिक, 12 की क्षमता 500 टेराफ्लॉप से एक पेटाफ्लॉप के बीच और 15 की क्षमता 500 टेराफ्लॉप से कम है। ये कंप्यूटिंग प्रदर्शन की माप हैं। मिशन का बताया कुल आंकड़ा भारत के हर सुपरकंप्यूटर की गिनती नहीं है। इससे अलग-अलग शोध परियोजनाओं के नतीजों की गुणवत्ता भी नहीं मापी जा सकती।

विवरण में शैक्षणिक और शोध संस्थानों में 123 पेटाफ्लॉप से अधिक संयुक्त क्षमता वाले कुल 50 सुपरकंप्यूटर स्थापित करने की योजना अलग से दी गई है। यह बड़ा आंकड़ा लक्ष्य है, पहले से उपलब्ध क्षमता नहीं। समीक्षा किए गए विवरण में पूरी नियोजित व्यवस्था चालू करने की तारीख नहीं दी गई है।

यह मिशन अप्रैल 2015 में लगभग ₹4,500 करोड़ के परिव्यय के साथ शुरू हुआ था। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग तथा इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय मिलकर इसका संचालन करते हैं। पुणे का सी-डैक और बेंगलुरु का भारतीय विज्ञान संस्थान इसे लागू करते हैं। कार्यक्रम में कंप्यूटिंग ढांचे के साथ सर्वर, नेटवर्किंग, शीतलन, सिस्टम सॉफ्टवेयर और विशेष उपयोगों पर काम शामिल है।

पीआईबी के अनुसार सितंबर तक देश में डिजाइन किए गए 6,000 रुद्र सर्वर परम रुद्र प्रणालियों में लगाए जा चुके थे और अन्य 1,500 का निर्माण चल रहा था। विवरण में 400 से अधिक संस्थानों के 16,000 से ज्यादा शोधकर्ताओं द्वारा उपयोग की जानकारी भी दी गई है। इनमें 2,900 से अधिक पीएचडी शोधार्थी हैं। बताए गए कुल आंकड़ों में 1.5 करोड़ से अधिक कंप्यूटिंग कार्य और 1,990 से ज्यादा शोध प्रकाशन शामिल हैं। ये कार्यक्रम के बारे में सरकार के संचयी आंकड़े हैं; इस रिपोर्ट में इन्हें स्वतंत्र ऑडिट के निष्कर्ष के रूप में पेश नहीं किया गया है।

पृष्ठभूमि विवरण में जलवायु मॉडलिंग, बाढ़ पूर्वानुमान, जीनोमिक्स, दवा खोज और पदार्थ विज्ञान में इस्तेमाल का उल्लेख है। ओएमएमकॉम पर चार अक्टूबर को प्रकाशित आईएएनएस की खबर ने भी क्षमता संबंधी इस जानकारी को रिपोर्ट किया। यह ढांचा ऐसे काम में मदद कर सकता है, लेकिन जारी विवरण से यह स्थापित नहीं होता कि कुल क्षमता के इस आंकड़े ने अपने आप मौसम पूर्वानुमान, इलाज या आपदा के नतीजों में कोई निश्चित सुधार किया है।