सुप्रीम कोर्ट ने 29 सितंबर को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत मुल्ला अफरोज की निवारक हिरासत रद्द कर दी और उसे कायम रखने वाला इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला भी निरस्त कर दिया। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने गैर-कानूनी हिरासत आदेश के लिए उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹10 लाख की लागत भी लगाई।

पीठ ने कहा कि पुलिस हिरासत में दिया गया कथित कबूलनामा अकेले निवारक हिरासत का आधार नहीं बन सकता। उसने यह भी पाया कि हिरासत का आदेश देने वाले अधिकारी ने तथ्यों पर उचित विचार नहीं किया। निवारक हिरासत का उद्देश्य पूरे हो चुके अपराध की सजा देना नहीं, बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था को संभावित खतरे से बचाना है; अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि इस मामले में उस शक्ति का गैर-कानूनी उपयोग हुआ।

अफरोज 24 नवंबर 2024 को संभल की शाही जामा मस्जिद के अदालत-आदेशित सर्वेक्षण के दौरान हुई हिंसा से जुड़े आपराधिक मामलों में आरोपी हैं; उस हिंसा में चार लोगों की मौत हुई थी। पुलिस ने उन्हें लगभग 54 दिन बाद गिरफ्तार किया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मामले के गुण-दोष तय किए बिना 9 सितंबर 2025 को एक मामले में जमानत दी, जिसके बाद संभल के जिलाधिकारी ने 13 अक्टूबर को NSA हिरासत आदेश जारी किया। हाई कोर्ट ने 8 जून 2026 को उस निवारक हिरासत को कायम रखा था।
सुप्रीम कोर्ट के सामने उत्तर प्रदेश सरकार ने दलील दी कि भविष्य में हिंसा या सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने की आशंका दिखाने वाली सामग्री हिरासत को सही ठहराने के लिए पर्याप्त थी। अफरोज ने कथित पुलिस-हिरासत कबूलनामे पर निर्भरता को चुनौती दी और कहा कि कई लंबित मामले अपने-आप हिरासत का आधार नहीं हो सकते। 29 सितंबर का फैसला NSA हिरासत अपील का निपटारा करता है; यह मूल आपराधिक मामलों में अफरोज को बरी नहीं करता और न ही अभियोजन के आरोपों की सत्यता तय करता है।
इस हिरासत रिकॉर्ड में जिम्मेदार सार्वजनिक अधिकारी संभल के जिलाधिकारी और उत्तर प्रदेश सरकार हैं, केंद्र सरकार नहीं। ₹10 लाख का निर्देश हिरासत आदेश के लिए राज्य के खिलाफ न्यायिक जवाबदेही का उपाय है। इसे 2024 की संभल हिंसा के दौरान पुलिस की हर कार्रवाई पर फैसला नहीं बताया जाना चाहिए।
