उत्तर प्रदेश के सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में मस्जिद गिराए जाने के बाद यह सवाल उठा है कि क्या बेदखली का निर्णय इमारत तोड़ने की अनुमति देता था। जिस भूमि को अधिकारी सरकारी बता रहे थे, उसे खाली करने के आदेश के खिलाफ अपील खारिज होने के बाद जिला प्रशासन ने 5 सितंबर को ढांचा गिरा दिया।
मस्जिद के संरक्षक तनवीर अहमद ने कहा कि बेदखली और ध्वस्तीकरण अलग कार्रवाइयां हैं और अपनाई गई प्रक्रिया को चुनौती दी। सिटी मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह ने प्रशासन की इस व्याख्या का बचाव किया कि बेदखली के बाद परिसर हटाया जाना था। विवाद स्थल पर कब्जे और ध्वस्तीकरण के कानूनी अधिकार दोनों से संबंधित है; बेदखली का फैसला अपने आप बाद की हर प्रशासनिक कार्रवाई को वैध साबित नहीं करता।
8 सितंबर के बयान में जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने कहा कि प्रतिनिधिमंडल ने प्रभावित लोगों और वकीलों से मुलाकात की तथा आगे कानूनी कार्रवाई पर विचार के लिए दस्तावेज जुटाए जा रहे हैं। उसने ध्वस्तीकरण की तेजी की आलोचना की। ये बयान प्रस्तावित कानूनी प्रतिक्रिया बताते हैं, पूरी हो चुकी अदालती चुनौती या कार्रवाई गैरकानूनी होने का न्यायिक निष्कर्ष नहीं।
