सुप्रीम कोर्ट ने 30 सितंबर को उत्तर प्रदेश पुलिस से उस एफआईआर पर नया स्पष्टीकरण मांगा जिसमें संदिग्ध को शुरू में अज्ञात बताया गया था, जबकि शिकायतकर्ता का कहना था कि उसे मौके पर पकड़ लिया गया था। बार एंड बेंच के अनुसार, न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा ने संबंधित अधिकारी को अगली सुनवाई में अधिक स्पष्ट हलफनामे के साथ उपस्थित रहने का निर्देश दिया।

एनडीटीवी की 30 सितंबर की अदालती रिपोर्ट भी पेशी के निर्देश की पुष्टि करती है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि संदिग्ध को पुलिस के हवाले करने के बावजूद उसका नाम नहीं लिखा गया और बाद में जांच की दिशा बदल गई। ये विवादित आपराधिक मामले में रखी गई दलीलें हैं। इस सुनवाई से संदिग्ध का दोष या कथित जांच खामियों के लिए अंतिम जिम्मेदारी तय नहीं हुई।

एएनआई की 30 सितंबर की खबर में उत्तर प्रदेश के वकील विजेंद्र सिंह का जवाब भी है। उन्होंने पुलिस के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियों की खबरों पर आपत्ति जताते हुए कहा कि अदालत ने याचिकाकर्ता की दलीलें दर्ज कीं और हलफनामा मांगा। राज्य ने कहा कि वह आरोपों का जवाब अदालत में देगा।

पुलिस बल को भंग करने पर चर्चा की खबरें मौखिक टिप्पणियों से संबंधित हैं, जिनका राज्य के वकील विरोध करते हैं। पुष्ट प्रक्रियात्मक कदम स्पष्टीकरण मांगना है। पुलिस बल भंग करने या उसकी सभी जांच सीबीआई को सौंपने का कोई आदेश स्थापित नहीं हुआ है। इस रिपोर्ट के लिए लिखित आदेश स्वतंत्र रूप से प्राप्त नहीं हुआ।