गुजरात हाईकोर्ट ने 30 सितंबर को अस्पताल में भर्ती पत्नी से मिलने के लिए आसाराम की 20 दिन की अस्थायी जमानत की मांग अस्वीकार कर दी। न्यायमूर्ति गीता गोपी और न्यायमूर्ति एल. एस. पीरजादा ने पुलिस की सत्यापन रिपोर्ट और इलाज कर रहे डॉक्टरों की जानकारी पर विचार करने के बाद रिहाई से इनकार किया। इस रिपोर्ट के लिए चार पन्नों का आदेश पढ़ा गया।

आसाराम के वकील आशीष डागली ने कहा कि उनके मुवक्किल को पत्नी की हालत की चिंता है और मानवीय आधार पर रिहाई मांगी। लोक अभियोजक हार्दिक दवे ने विरोध करते हुए कहा कि मेडिकल जानकारी से तत्काल रिहाई की जरूरत साबित नहीं होती। पीठ ने पाया कि इलाज का असर हुआ है और डॉक्टरों के अनुसार हालत अनुकूल रहने पर दो या तीन दिनों में छुट्टी दी जा सकती है।

अदालत ने यह भी दर्ज किया कि रिश्तेदार और अन्य लोग उनकी देखभाल कर रहे हैं। उसने कहा कि जोधपुर की जेल में बंद आसाराम पत्नी से वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए बात करने की अनुमति के लिए जेल अधीक्षक से अनुरोध कर सकता है। यह अनुरोध करने की छूट है; आदेश से यह साबित नहीं होता कि कॉल की अनुमति मिल गई है या बातचीत हो चुकी है।

आसाराम दुष्कर्म के दो मामलों में उम्रकैद की सजा काट रहा है। पीटीआई की 30 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार गुजरात की दोषसिद्धि के खिलाफ उसकी अपील लंबित है। यह आदेश केवल अस्थायी रिहाई की अर्जी से संबंधित है और किसी भी दोषसिद्धि को रद्द नहीं करता। बार एंड बेंच की अदालती रिपोर्ट भी स्वतंत्र रूप से जमानत से इनकार और वीडियो कॉल के लिए अनुरोध की छूट की पुष्टि करती है। पीड़िताओं की पहचान उजागर करने वाली जानकारी शामिल नहीं की गई है।