29 सितंबर को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96.1475 तक गिरा, जो दो महीने का सबसे कमजोर स्तर था, लेकिन बाद में संभलकर लगभग सपाट 95.98 पर बंद हुआ। कारोबारियों ने कहा कि सरकारी बैंकों की डॉलर बिक्री—संभवतः भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से—ने गिरावट सीमित करने में मदद की। यह बाजार का आकलन है, केंद्रीय बैंक की सार्वजनिक पुष्टि नहीं।

भारतीय शेयर बाजार भी नीचे बंद हुए। निफ्टी 50 में 0.28% की गिरावट आई और वह 22,716.2 पर बंद हुआ, जबकि बीएसई सेंसेक्स 0.33% गिरकर 72,529.07 पर रहा। मासिक डेरिवेटिव अनुबंधों की समाप्ति के दौरान क्लोजिंग ऑक्शन में निफ्टी का संकेतक स्तर थोड़ी देर के लिए कहीं अधिक गिरा दिखा, लेकिन बेंचमार्क की अंतिम गिरावट 0.28% ही थी; अस्थायी ऑक्शन चाल को दिन का आधिकारिक बंद स्तर नहीं बताना चाहिए।

मंगलवार तक छुट्टियों से छोटे हुए कारोबारी सप्ताह में दोनों बेंचमार्क करीब 2% गिर चुके थे; इससे पहले के सात हफ्तों में उनमें लगभग 6% की कमी आई थी। विदेशी संस्थागत निवेशकों ने सोमवार को ₹53.53 अरब के भारतीय शेयर बेचे और सितंबर में रिपोर्टिंग समय तक उनकी शुद्ध बिक्री $2.17 अरब थी। मंगलवार को 16 प्रमुख सेक्टर सूचकांकों में से 13 गिरे; स्मॉल-कैप सूचकांक 0.8% और मिड-कैप सूचकांक 1% नीचे रहा।

ब्रेंट कच्चा तेल सत्र में करीब $108 तक पहुंचने के बाद लगभग $105 प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था, जबकि अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड 5.27% से ऊपर चली गई। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 90% आयात करता है, इसलिए महंगा तेल डॉलर की मांग बढ़ा सकता है और आयात बिल, महंगाई तथा कंपनियों की लागत को लेकर चिंता पैदा कर सकता है। ये असर पहुंचने के जोखिम हैं, यह प्रमाण नहीं कि हर उपभोक्ता कीमत या कंपनी का मार्जिन पहले ही किसी निश्चित मात्रा से बदल चुका है।

दिन के निचले स्तर से रुपये की वापसी और बाद में तेल के नरम पड़ने से साफ है कि यह अस्थिर बाजार का एक स्थिति-चित्र है, एकतरफा पूर्वानुमान नहीं। आगे की चाल तेल आपूर्ति, वैश्विक बॉन्ड यील्ड, विदेशी निवेश प्रवाह और केंद्रीय बैंक की किसी कार्रवाई पर निर्भर करेगी। बंद स्तर केवल 29 सितंबर की स्थिति बताते हैं; इन्हें निवेश सलाह नहीं माना जाना चाहिए।