केंद्रीय जल आयोग से जुड़े आंकड़ों के अनुसार 24 सितंबर को भारत के 178 प्रमुख जलाशयों में 130.75 अरब घन मीटर पानी था। यह उनकी संयुक्त उपयोगी भंडारण क्षमता का लगभग 71% था। इन्हीं निगरानी वाले जलाशयों में 2025 में इसी समय 165.88 अरब घन मीटर पानी था; इस बार मात्रा सालाना आधार पर लगभग 21% कम थी। ये आंकड़े निगरानी वाले जलाशयों के हैं, भारत की हर नदी, कुएं या जलस्रोत के नहीं।

क्षेत्रों के बीच अंतर बड़ा है। दक्षिणी राज्यों के निगरानी वाले 50 जलाशयों में लगभग 27.93 अरब घन मीटर पानी था, यानी उनकी उपयोगी क्षमता का आधा; एक साल पहले तुलनीय हिस्सा लगभग 87% था। उत्तर के 11 जलाशयों में लगभग 12.43 अरब घन मीटर पानी था, जो क्षमता का करीब 63% है। दक्षिणी समूह में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु आते हैं; उत्तरी समूह में हिमाचल प्रदेश, पंजाब और राजस्थान हैं। क्षेत्रीय औसत से हर बांध या जिले की स्थिति नहीं जानी जा सकती।

कुछ जगह बीच के पखवाड़े में बारिश होने के बावजूद पूरे देश के जलाशयों में पानी की मात्रा 10 सितंबर के 130.55 अरब घन मीटर से केवल थोड़ी अधिक थी। दक्षिण और उत्तर के विपरीत, 24 सितंबर को पश्चिमी और मध्य क्षेत्रों के निगरानी वाले जलाशय अपनी क्षमता के लगभग 85% और 86% पर थे। दक्षिण-पश्चिम मानसून का निर्धारित मौसम 30 सितंबर को समाप्त होने के करीब है; ऐसे में यह असमानता सिंचाई, पनबिजली और पेयजल के लिए पानी छोड़ने की योजना में मायने रखती है।

कम भंडारण आने वाले सूखे महीनों के लिए चिंता बढ़ाता है, खासकर जहां खेती जलाशयों पर निर्भर है। लेकिन केवल इस एक स्थिति-चित्र से घरों में तत्काल पानी की कमी या हर राज्य में सूखा साबित नहीं होता। स्थानीय परिणाम बारिश, भूजल, प्रणालियों के बीच पानी पहुंचाने और जलाशयों से पानी छोड़ने के फैसलों पर भी निर्भर करेंगे। मानसून के बाद की पूरी स्थिति पर निष्कर्ष निकालने से पहले बाद के साप्ताहिक आंकड़ों से इन संख्याओं का मिलान जरूरी है।