पत्रकार शाहीन खान और नफीसा खान का कहना है कि 3 सितंबर को वरिष्ठ सरकारी नेताओं की मौजूदगी वाले अस्पताल कार्यक्रम की कवरेज के दौरान दिल्ली पुलिसकर्मी उन्हें साकेत थाने ले गए। दोनों महिलाओं का आरोप है कि थाने के भीतर पुलिसकर्मियों ने उनके साथ मारपीट की और उनकी मुस्लिम पहचान पर टिप्पणियां कीं। ये पत्रकारों के आरोप हैं, पुलिसकर्मियों के विरुद्ध स्थापित निष्कर्ष नहीं।

दक्षिण जिले के पुलिस उपायुक्त अनंत मित्तल ने अलग विवरण दिया। उनके अनुसार, महिलाओं ने विशिष्ट सुरक्षा प्राप्त अधिकारियों के लिए निर्धारित मार्ग पर स्कूटर खड़ा किया, उसे हटाने के बार-बार दिए निर्देश नहीं माने और आगे की पूछताछ के लिए उन्हें थाने ले जाया गया। पुलिस ने मारपीट के आरोप को झूठा और भ्रामक बताया। पत्रकारों द्वारा जारी वीडियो में कुछ निशान दिखाई दिए, जिन्हें उन्होंने कथित पिटाई से जुड़ा बताया; केवल इन तस्वीरों से निशानों का कारण स्थापित नहीं होता।

3 सितंबर को कई पत्रकार संगठनों ने संयुक्त रूप से कार्रवाई और निष्पक्ष जांच की मांग की। 4 सितंबर की प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिलाओं और उनके संपादक ने कहा कि वे थाने की सीसीटीवी रिकॉर्डिंग मांगेंगे और कानूनी उपाय अपनाएंगे। यह घोषित योजना थी; इस रिपोर्ट के लिए जांची गई सामग्री से यह स्थापित नहीं होता कि अदालत में याचिका दाखिल हुई या रिकॉर्डिंग जारी हुई।
12 सितंबर को अधिकार संगठन सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस ने प्राथमिकी, कैमरा रिकॉर्डिंग के संरक्षण और स्वतंत्र जांच की मांग वाली याचिका प्रकाशित की। यह संगठन की मांग है, अदालत का आदेश या दोष का प्रमाण नहीं। उपलब्ध विवरणों से यह तय नहीं होता कि बाद में किसी स्वतंत्र जांच ने निष्कर्ष निकाला या नहीं; पुलिस का खंडन और महिलाओं के आरोप अब भी विवादित हैं।
