मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली में प्रदर्शन के तीसरे दिन, चार अक्टूबर को पुलिस ने ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की अध्यक्ष नेहा बोरा और अन्य प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया। स्क्रॉल और द न्यू इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित आइसा सदस्यों के बयानों के अनुसार बोरा को बाद में रिहा कर दिया गया। रविवार की यह नई कार्रवाई दो और तीन अक्टूबर की हिरासत की घटनाओं से अलग है।

आइसा का मार्च अशोक रोड पर आंध्र भवन सर्कल के आसपास से शुरू हुआ। प्रतिभागियों ने जंतर-मंतर की ओर बढ़ने की कोशिश की तो पुलिस ने बैरिकेड पर रोक दिया। चार अक्टूबर को स्क्रॉल की रिपोर्ट, जिसमें संवाददाता प्रियाली ढींगरा का योगदान भी था, में फिर लोगों को हिरासत में लेने और प्रदर्शनकारियों द्वारा बोरा को ले जा रही गाड़ी को रोकने की कोशिश का विवरण है।

आइसा ने चार अक्टूबर के बयान में आरोप लगाया कि बोरा को बिना महिला कांस्टेबल के एक अनधिकृत वाहन में ले जाया गया और शुरुआत में गंतव्य की जानकारी नहीं दी गई। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के हवाले से इन आरोपों को खारिज किया। अधिकारी ने कुछ प्रदर्शनकारियों पर पुलिसकर्मियों पर हमला करने का आरोप भी लगाया। किसी भी पक्ष का यह विवरण अंतिम जांच निष्कर्ष नहीं है। आइसा के पूर्व अध्यक्ष एन. साई बालाजी ने बाद में बताया कि बोरा को नरेला औद्योगिक क्षेत्र थाने से छोड़ दिया गया। अपनी अगली पोस्ट में उन्होंने कहा कि वे बोरा के साथ हैं और सुरक्षित लौट रहे हैं।

अलग प्रदर्शन में इंडिया गेट पर हिरासत में लिए गए आप कार्यकर्ताओं में दिल्ली इकाई के अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज और विधायक संजीव झा भी थे, द न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने बताया। एएनआई की चार अक्टूबर की रिपोर्ट में भारद्वाज ने पुलिस पर धक्का-मुक्की का आरोप लगाया। उन्होंने अपने सार्वजनिक खाते पर भी यह आरोप लगाया। समीक्षा की गई रिपोर्टों से सभी जगहों की हिरासत की अंतिम कुल संख्या या हर व्यक्ति की रिहाई की स्थिति की पुष्टि नहीं होती।

प्रदर्शन मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं, विशेष गहन पुनरीक्षण और प्रदर्शनों के दौरान पुलिस के व्यवहार को लेकर हैं। मतदाता सूची से जुड़े आरोप विवादित हैं। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार निर्वाचन आयोग ने कहा है कि उसके आदेश कानूनी प्राधिकार और निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुरूप हैं। रविवार की हिरासत की कार्रवाई से यह विवाद तय नहीं होता और न ही प्रदर्शनकारियों या पुलिसकर्मियों का दोष सिद्ध होता है।