विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने चार अक्टूबर को बताया कि भारत काला सागर में जहाजों की सुरक्षा, अनाज और ऊर्जा निर्यात तथा हमले रोकने की संभावनाओं पर रूस और यूक्रेन, दोनों से बातचीत कर रहा है। नई दिल्ली में म्यूनिख लीडर्स मीटिंग को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि पिछले कुछ महीनों में भारत की कूटनीतिक भागीदारी बढ़ी है। उन्होंने किसी सहमत युद्धविराम की घोषणा नहीं की। न ही कहा कि दोनों पक्षों ने कोई साझा समझौता स्वीकार कर लिया है।
मंत्री के अनुसार भारत की भूमिका बातचीत की अपील करने से आगे बढ़कर दोनों देशों की तात्कालिक चिंताओं पर चर्चा तक पहुंची है। इसकी शुरुआत जहाजों की सुरक्षा से हुई और फिर दूसरे मुद्दे भी शामिल हुए। उनके बयान में ये चर्चाएं अभी जारी हैं। किसी प्रस्तावित समझौते का पूरा पाठ, उसे लागू करने की समयसीमा, निगरानी व्यवस्था या गारंटी नहीं बताई गई।
इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार शुभजीत रॉय और समाचार एजेंसी एएफपी ने इन टिप्पणियों की अलग-अलग रिपोर्टिंग की। जयशंकर के अपने सार्वजनिक खाते पर चार अक्टूबर को कार्यक्रम के प्रसारण साझा हुए, जिनमें स्थान नई दिल्ली बताया गया। एक पोस्ट में म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन के अध्यक्ष वोल्फगांग इशिंगर और जर्मनी के विदेश कार्यालय के राज्य सचिव बर्नार्ड कोत्श के साथ बातचीत का उल्लेख है।
मॉस्को के साथ भारत के संबंधों की व्याख्या करते हुए जयशंकर ने उन मौकों को याद किया, जब भारत की सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता पर खतरे के दौरान सोवियत संघ और रूस ने साथ दिया था। उन्होंने कहा कि यह इतिहास आज भी संबंधों को प्रभावित करता है। अब इन संबंधों में व्यापार, निवेश, ऊर्जा, परमाणु और अंतरिक्ष सहयोग भी शामिल हैं। उन्होंने कीव से संपर्क के साथ भारत की कूटनीतिक स्थिति समझाने के लिए यह संदर्भ दिया।
अपने व्यापक संबोधन में उन्होंने उभरते देशों और मध्यम शक्तियों से अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा, भरोसेमंद आपूर्ति शृंखलाओं, स्वास्थ्य, संपर्क सुविधाओं, जलवायु कार्रवाई और रक्षा में सहयोग बढ़ाने को कहा। उनका तर्क था कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और गठबंधनों में बदलाव के बीच सबसे बड़ी शक्तियों के अलावा दूसरे देश भी संसाधन जुटाकर एक-दूसरे की कूटनीतिक कोशिशों को सहारा दे सकते हैं।
रविवार की महत्वपूर्ण नई जानकारी यह है कि भारत ने जारी चर्चा के विषय सार्वजनिक रूप से बताए हैं। समीक्षा किए गए बयानों से यह स्थापित नहीं होता कि इन कोशिशों के कारण काला सागर में जहाजों की सुरक्षा बढ़ गई है, निर्यात की बाधाएं हट गई हैं या हमले रुक गए हैं। ऐसे नतीजों के लिए संबंधित पक्षों की अलग पुष्टि और अमल के प्रमाण जरूरी होंगे।
