सुप्रीम कोर्ट ने 29 सितंबर को एक याचिका अगले सप्ताह सूचीबद्ध करने पर सहमति दी, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में चुनाव आयोग के कामकाज पर सवाल उठाया गया है और देशव्यापी मतदाता-सूची विशेष गहन पुनरीक्षण को अमान्य घोषित करने की मांग है। याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह के वकील ने जल्द सुनवाई मांगी, जिसके बाद मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने शीघ्र सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।
याचिका का आरोप है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पुनरीक्षण से जुड़े फैसलों पर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज कीं। उसका तर्क है कि संविधान का अनुच्छेद 324 और 2023 के कानून की धारा 18 तीन-सदस्यीय आयोग से सर्वसम्मति से या मतभेद होने पर बहुमत से फैसला करने की मांग करते हैं। ये याचिकाकर्ता के आरोप और कानूनी दलीलें हैं, सुप्रीम कोर्ट के निष्कर्ष नहीं।
चुनाव आयोग ने कहा है कि दोनों आयुक्तों द्वारा कैबिनेट सचिव को भेजे गए पत्र प्रतिनियुक्ति पर एक अधिकारी से संबंधित थे और नीति या सूचना-प्रौद्योगिकी फैसलों के बारे में नहीं थे। पहले के एक जवाब में आयोग ने कहा था कि पुनरीक्षण संबंधी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। ये जवाब महत्वपूर्ण हैं क्योंकि याचिका अदालत से किसी पक्ष के सार्वजनिक दावे को मानने के बजाय आयोग के मूल रिकॉर्ड देखने की मांग करती है।
याचिकाकर्ता ने CEC के अधिकार पर क्वो वारंटो जांच, आयोग के मूल रिकॉर्ड पेश करने और केवल पुनरीक्षण के तहत किए गए मतदाता-सूची बदलावों को अमान्य घोषित करने की मांग की है। अदालत ने इनमें से कोई राहत नहीं दी, अंतिम फैसला नहीं सुनाया और इस कार्यवाही में पुनरीक्षण पर रोक नहीं लगाई। 29 सितंबर का घटनाक्रम मामले को अगले सप्ताह सूचीबद्ध करने का निर्देश है—यह निर्णय नहीं कि CEC ने गैर-कानूनी काम किया या कोई मतदाता-सूची बदलाव शून्य है।
