दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार, पांच अक्टूबर को उत्तर-पूर्वी दिल्ली के 2020 के दंगों और जामिया मिल्लिया इस्लामिया में दिसंबर 2019 की हिंसा की स्वतंत्र जांच मांगने वाली याचिकाओं के समूह खारिज कर दिए। द इंडियन एक्सप्रेस, एएनआई और एबीपी लाइव की अलग-अलग रिपोर्टों के अनुसार, न्यायमूर्ति विवेक चौधरी और न्यायमूर्ति मनोज जैन की पीठ ने फैसला सुनाया।
दंगों से जुड़ी याचिकाओं में विशेष जांच दल बनाने तथा कथित भड़काऊ भाषणों और पुलिस के गलत आचरण पर आपराधिक मामले दर्ज करने सहित कई मांगें की गई थीं। अलग-अलग याचिकाकर्ताओं ने एक से अधिक राजनीतिक दलों के नेताओं के खिलाफ कार्रवाई मांगी थी। ये किसी एक संगठन के खिलाफ की गई एक ही शिकायत नहीं थीं।
द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, वृंदा करात और जमीयत उलेमा-ए-हिंद की याचिकाओं में पुलिस की कथित निष्क्रियता और भड़काऊ भाषणों के मुद्दे उठाए गए थे। अन्य याचिकाकर्ताओं ने हिंसा के कथित वित्तपोषण की जांच और कांग्रेस नेताओं के खिलाफ कार्रवाई मांगी थी। शेख मुज्तबा फारूक ने दिल्ली पुलिस से स्वतंत्र जांच दल की मांग की थी। ये याचिकाकर्ताओं के आरोप और मांगी गई राहत थीं।
जामिया से जुड़े मामलों में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शनों के दौरान छात्रों पर कथित पुलिस हिंसा की स्वतंत्र जांच मांगी गई थी। एएनआई के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने जांच दूसरी एजेंसी को सौंपने का विरोध किया और अदालत से कहा कि विश्वविद्यालय के भीतर, बाहर तथा आसपास के इलाकों का सीसीटीवी फुटेज एकत्र करके सुरक्षित रखा गया है। यह पुलिस का पक्ष है; फुटेज का स्वतंत्र सत्यापन नहीं।
हाई कोर्ट की पांच अक्टूबर की आधिकारिक फैसला-सुनाने की सूची में संबंधित मामले इसी पीठ के सामने सुबह साढ़े दस बजे के लिए दर्ज थे। उस समय की रिपोर्टों के अनुसार, पीठ ने दोनों समूहों की याचिकाएं खारिज कर दीं और विस्तृत फैसलों का इंतजार था। यह सूची मामलों के निर्धारित होने की पुष्टि करती है, खारिज किए जाने के कारण नहीं बताती।
नई खबर इन याचिकाओं का निपटारा है, हिंसा की कोई नई घटना नहीं। लिखित कारणों के बिना यह कहना जल्दबाजी होगी कि अदालत ने हर आरोप झूठा पाया या किसी व्यक्ति को सभी आरोपों से बरी कर दिया। देखी गई सामग्री से यह भी स्थापित नहीं होता कि इन घटनाओं से जुड़े अलग आपराधिक मामले बंद कर दिए गए हैं।
