दिल्ली हाईकोर्ट ने 30 सितंबर को उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत से इनकार के खिलाफ अपीलें खारिज कर दीं। मामला 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की कथित व्यापक साजिश से जुड़ा है। लाइव लॉ और इंडियन एक्सप्रेस ने उसी सुबह इस नए फैसले की खबर दी। मामले में गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम यानी यूएपीए के आरोप भी हैं; जमानत खारिज होना दोषसिद्धि नहीं है।

लाइव लॉ के अनुसार, न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति दिनेश भट्ट ने कहा कि वे दोबारा जमानत मांगने के लिए सुप्रीम कोर्ट की 5 जनवरी की शर्तों से बंधे हैं। उन शर्तों के अनुसार, अभियोजन के संरक्षित गवाहों का परीक्षण पूरा होने या उस आदेश के एक वर्ष बाद, जो पहले हो, खालिद और इमाम फिर जमानत मांग सकते हैं। जनवरी के फैसले के अनुच्छेद 432 में यही व्यवस्था दर्ज है।

बार एंड बेंच की 30 सितंबर की अदालती रिपोर्ट के मुताबिक, हाईकोर्ट ने कहा कि ये शर्तें अभी पूरी नहीं हुई हैं और वह सुप्रीम कोर्ट के निर्देश बदल नहीं सकता। अपीलों में निचली अदालत के 4 जुलाई के आदेश को चुनौती दी गई थी। जनवरी का निर्णय आज के अलग हाईकोर्ट फैसले की पृष्ठभूमि है।

बचाव पक्ष ने दलील दी कि मुकदमे में प्रगति नहीं हो रही है। उसने देरी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के बाद के फैसलों पर भी भरोसा किया। अभियोजन की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस. वी. राजू ने रिहाई का विरोध किया और कहा कि दोनों की कथित भूमिकाएं जमानत पाए सह-आरोपियों से अलग हैं। आज के तर्कों का यह विवरण स्वतंत्र रूप से प्रकाशित अदालती खबरों पर आधारित है; समीक्षा किए गए स्रोतों में नया लिखित आदेश उपलब्ध नहीं था।