सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 5 अक्टूबर को संकेत दिया कि विधायी विशेषाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े व्यापक संवैधानिक सवालों पर फिलहाल फैसला टाला जा सकता है। यह बात तब सामने आई जब तमिलनाडु विधानसभा की ओर से बताया गया कि जिस 2003 के प्रस्ताव से यह पुराना मामला शुरू हुआ था, उसे 2004 में वापस ले लिया गया था।

विधानसभा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ को प्रस्ताव वापस लिए जाने की जानकारी दी। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या मूल विवाद पर अब भी निर्णय जरूरी है और कहा कि मामला बड़ी पीठ को भेजे जाने के आदेश में इस तथ्य का उल्लेख नहीं था। पीठ ने उनसे सात न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ के सामने संबंधित प्रस्ताव रखने को कहा।

मुख्य न्यायाधीश ने सुझाव दिया कि यदि मूल विवाद समाप्त हो चुका है, तो संवैधानिक प्रश्नों को किसी दूसरे मामले के लिए खुला रखते हुए यह कार्यवाही समाप्त की जा सकती है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता भी इस बात से सहमत थे कि मामला अब केवल सैद्धांतिक रह गया हो सकता है। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि मूल विवाद समाप्त होने पर भी व्यापक सवालों का महत्व बना हुआ है।

एन. रवि का मामला 2003 में अखबार के पत्रकारों के खिलाफ तमिलनाडु विधानसभा की विशेषाधिकार हनन संबंधी कार्रवाई से शुरू हुआ था। बाद में इसमें विधायिकाओं के विशेषाधिकारों और अभिव्यक्ति तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता सहित संवैधानिक अधिकारों के आपसी संबंध पर सवाल उठे। पत्रकारों और अन्य आवेदकों ने इसमें हस्तक्षेप की अनुमति मांगी है, क्योंकि निर्णय का असर विधायी संस्थाओं की आलोचना और उनके बारे में रिपोर्टिंग पर पड़ सकता है।

सात न्यायाधीशों की पीठ मंगलवार, 6 अक्टूबर को इस स्थिति पर संक्षिप्त विचार कर सकती है। सोमवार की टिप्पणियों से न तो मामला अंतिम रूप से समाप्त हुआ है, न यह तय हुआ है कि विधायी विशेषाधिकार मौलिक अधिकारों से ऊपर हैं या नहीं। फिलहाल प्रश्न यह है कि प्रस्ताव वापस लिए जाने की जानकारी के बाद इस खास मामले को आगे बढ़ाना चाहिए या नहीं। व्यापक संवैधानिक विवाद अभी अनसुलझा है।